‘एलिस एक्का की कहानियां’ और ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ पुस्तकों का लोकार्पण
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‘एलिस एक्का की कहानियां’ और ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ पुस्तकों का लोकार्पण

‘एलिस एक्का की कहानियां’ और ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ पुस्तकों का लोकार्पणरांची, झारखण्ड । नवम्बर । 22, 2015 :: आदिवासी समाज का जीवन और अनुभव जब कहन बन कर आता है तो हम एक नये दर्शन से परिचित होते हैं। यह दर्शन सहअस्तित्व और सहजीविता का है जो एलिस की कहानियों में है और जिसकी बुनावट बहुत बारीक है। एलिस अपनी कहानियों में साठ के दशक के आदिवासी उम्मीदों को सामने रखती हैं। लेकिन बाद में वे उस छल को भी अभिव्यक्त करती हैं जिसका शिकार आदिवासी समाज बनता है। ये बातें आज ‘एलिस एक्का की कहानियां’ और ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ पुस्तकों के लोकार्पण के अवसर पर वक्ताओं ने कही। पुस्तकों का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार डा. माया प्रसाद, नवोदित कवयित्री अणिमा बिरजिया, कथाकार एलिस एक्का की भाभी एलिस आईंद और उनके बेटे तथा गोस्सनर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सिद्धार्थ एक्का ने किया।  सूचना भवन के सभागार में हुए इस कार्यक्रम का आयोजन झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा ने किया था।

लोकार्पण के बाद एलिस की कहानियों पर बोलते हुए सुप्रसिद्ध आदिवासी कथाकार पीटर पॉल एक्का ने कहा कि उनकी कहानियां सीधे दिल को छूती हैं। आदिवासियों के लिखने की शैली बहुत सहज है उनके अपने जीवन की तरह। वंदना जी ने उनके जीवन और रचनाओं को गुमनामी से निकाल कर सामने लाने का महत्वपूर्ण काम किया है। उपन्यासकार विनोद कुमार ने अपने समालोचकीय वक्तव्य में एलिस को आदिवासी कहन की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति बताया। विनोद कुमार ने कहा कि एलिस बहुत संपन्न आदिवासी परिवार से थीं इसीलिए उनकी कहानियों में आदिवासी समाज में मौजूद विरोधाभास भी साफ-साफ दिखलाई पड़ता है। रोमांटिसिज्म और व्यवस्था के प्रति सकारात्मकता भी कहानियों में है पर इसके बावजूद अंततः अपनी रचनाओं से हमें वे उस कड़वे यथार्थ तक ले जाती हैं जहां आदिवासियों के प्रति छल है, अविश्वास है, लूट है।

वरिष्ठ साहित्यकार डा. माया प्रसाद ने अपने वक्तव्य में जहां एलिस की विरासत को सहेजने  के महत्व की सराहना की, वहीं एलिस एक्का के बेटे और गोस्सनर कॉलेज के प्राचार्य डा. सिद्धार्थ एक्का ने अपनी मां से जुड़े अनुभव साझा किये। डॉ. एक्का ने कहा कि उनकी मां बहुत अध्ययनशील, अन्वेषी और विश्व साहित्य की गहरी समझ रखने वाली थीं। इसीलिए उनकी कहानियों के पात्र बहुत मामूली लोग हैं। जैसे सब्जी बेचने वाले, मजदूरी करने वाले और गांव के आम लोग।

‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ पुस्तक पर समालोचकीय वक्तव्य जानेमाने लेखक, पत्रकार और मीडियाकर्मी शिशिर टुडू ने रखा। उन्होंने कहा कि आदिवासी जीवन जिस दर्शन से संचालित होता है, उसे जानने-समझने की कोशिश अब तक नहीं हुई है। हम समाज और पर्यावरण के, राजनीति के संकटों पर बातें करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंतित हैं लेकिन इसका उपचार जिस आदिवासी दर्शन में है और जो उनके वाचिक व लिखित साहित्य के द्वारा उद्घाटित हो रहा है, उसकी अनदेखी करते हैं। यह पुस्तक आदिवासी दर्शन और साहित्य को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

लोकार्पण के मौके पर दोनों पुस्तकों की संपादक वंदना टेटे ने कहा कि एलिस एक्का हमारी विरासत हैं। उनका लेखन और पचास के दशक से हिंदी साहित्य में उनकी उपस्थिति इस मिथ को तोड़ती हैं कि आदिवासियों ने हाल के दिनों में लिखना शुरू किया है। उन्होंने कहा कि एलिस अपनी कहानियों से आदिवासी समाज की व्यापक दृष्टि को सामने रखती हैं और हिंदी साहित्य को देश की पहली महिला आदिवासी कथा लेखन की उस परंपरा से जोड़ती हैं, जिसे लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है।

कार्यक्रम का संचालन नवोदित समालोचक डा. सावित्री बड़ाईक ने किया जबकि संस्कृतिकर्मी अश्विनी कुमार पंकज ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस मौके पर एलिस एक्का के परिवार जनों में डा. सिद्धार्थ एक्का, आनंद जोसेफ तिग्गा, सोनाली, रिसी एक्का, आशीष पूर्ति, रितु पूर्ति, एलिस आईंद सहित महादेव टोप्पो, जोवाकिम तोपनो, रेमिस कंडुलना, विद्याभूषण, रतन तिर्की, अरविंद अविनाश, संजय भालोटिया, शेषनाथ वर्णवाल, अविनाश बाड़ा, डा. सुनीता, महेश मांझी, डा. अर्चना कुमारी, आलोका कुजूर, शैलबाला टेटे, सविता मुंडा, विद्यासागर, संजय षड़ंगी, अनुराधा मुंडू, खातिर हेमरोम, जान कंडुलना आदि जानेमाने साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

एलिस एक्का

एलिस एक्का का जन्म लगभग एक सदी पहले 1917 में हुआ था और मृत्यु 1978 में। अंग्रेजी साहित्य में वे झारखंड की पहली महिला आदिवासी ग्रेजुएट थीं। उन्होंने चालीस-पचास के दशक में रचनाएं लिखनी शुरू की कथा साहित्य प्रमुख है। उन्होंने विदेशी साहित्य का अनुवाद भी किया, विशेषकर अपने प्रिय दार्शनिक लेखक खलील जिब्रान का। वे मुंडा समुदाय के पूर्ति गोत्र से थीं और उनका परिवार बिरसा मुंडा के खानदान से संबंधित है। उलगुलान विद्रोह के ठीक पहले उनके दादा उलीहातु छोड़कर सिमडेगा जा बसे थे। किताब की भूमिका में वंदना टेटे ने विस्तार से उनके परिवार, निजी जीवन और आदिवासी एवं भारतीय साहित्य में एलिस पूर्ति के योगदान को रेखांकित किया है। एलिस ने हिंदी में कहानियां लिखी और जीते जी उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया। उनकी मृत्यु के लगभग चार दशक बाद वंदना टेटे ने गुमनाम हो चुकी एलिस एक्का और उनकी 11 रचनाओं को ‘एलिस एक्का की कहानियां’ में संग्रहित कर सामने लाने का महत्वूर्ण कार्य किया है। पुस्तक का प्रकाशन राजकमल समूह, दिल्ली के राधाकृष्ण प्रकाशन से हुआ है।

लोकार्पित होने वाली दूसरी पुस्तक ‘आदिवासी दर्शन और साहित्य’ आदिवासी साहित्य विमर्श को नया आयाम देते लेखों का संकलन है। संकलन में जयपाल सिंह मुंडा, हेरॉल्ड सैमसन तोपनो, रोज केरकेट्टा, सेम तोपनो, वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’, रेमिस कंडुलना, जोवाकिम तोपनो, गीताश्री उरांव  , गंगा सहाय मीणा, अनुज लुगुन, ग्लैडसन डुंगडुंग, डॉ. सावित्री बड़ाईक और कृष्णमोहन सिंह मुंडा सहित वंदना टेटे के वैचारिक आलेख सम्मिलित हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन विकल्प प्रकाशन, दिल्ली ने किया है।

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