बाल मित्र बनेंगे, झारखंड के ग्राम पंचायत

 Lens Eye - News Portal - बाल मित्र बनेंगे झारखंड के ग्राम पंचायतरांची, झारखण्ड 20 जून 2014 ::  झारखंड के 75 ग्राम पंचायतों के मुखियाओं ने अपने-अपने पंचायत को बाल मित्र बनाने का संकल्प दोहराया। राज्य के 24 जिलों के इन 75 ग्राम पंचायत के अंतर्गत 500 गांव आते हैं। अगुआ बाल मित्र पंचायत बनने के इच्छुक ग्राम पंचायतों में सबसे अधिक रांची के 26, उसके बाद रामगढ के 10, और खुंटी के 6 हैं।

 ‘‘बाल मित्र अगुआ पंचायत’’ नामक इस कार्यक्रम का उद्देष्य ग्राम पंचायतों को बाल-मित्र बनाना है। इस कार्यक्रम को पंचायती राज विभाग, यूनिसेफ और राज्य विकास संस्थान (सर्ड) के सहयोग से चलाया जा रहा है। पंचायती राज विभाग ने  इस कार्यक्रम को सहयोग प्रदान करने के लिए सभी जिले के उपायुक्तों, उप विकास आयुक्तों और जिला पंचायत अधिकारियों को पत्र लिखा है। यह कार्यक्रम यूनिसेफ  के ‘‘शिशु  मित्र अस्पताल’’ और ‘‘बाल मित्र थाना’’ कार्यक्रम के बाद की अगली कड़ी में है।

 75 पंचायतों के मुखियाओं ने आज सर्ड में बाल मित्र अगुआ पंचायत पर आयोजित दो दिवसीय उन्मुखीकरण एवं योजना निर्माण कार्यषाला में  भाग लिया। इस दौरान अगुआ पंचायत कार्यक्रम और गांवों को खुले से शौच मुक्त करने की सफल कहानियों पर आधारित  डाक्यूमेंट भी जारी किया गया।

 झारखंड मे बाल मित्र पंचायत का विचार, केरल के पंचायती राज पद्धति का अध्ययन करने गए मुखियाओं के द्वारा आया है। इन्हीं में से एक मुखिया, रामगढ़ जिले के सिरका पंचायत की मुखिया मंजू जोषी का कहना था ‘‘ हम केरल में चलाए जा रहे ‘बाल पंचायत’ कार्यक्रम से प्रभावित थे, और हमने इसे अपने पंचायत में इसका प्रयोग करने का निर्णय लिया। यह हमारा विचार और कार्यक्रम है, जिसे सरकार, यूनिसेफ और सर्ड ने अपना समर्थन और सहयोग दिया है ’’। वहीं बोकारो जिले के मधुकरपुर पंचायत की मुखिया तारा देवी काकहना था, ‘‘हमने विभिन्न क्षेत्रों में परिणाम दिए हैं। उदाहरण के तौर पर, हमारे पंचायत के सभी ग्रामीणों ने यह संकल्प लिया है कि वे न तो बाल विवाह आयोजित करेंगे और न उसमें शामिल होंगे। हमने 100 प्रतिषत जन्म पंजीकरण को सुनिष्चित करने के लिए एक अभियान भी अपने पंचायत में शुरू किया है।’’ रामगढ़ जिले की दोहाकातुक पंचायत की मुखिया, कलावती देवी कहती हैं-‘‘ आंगनबाड़ी केंद्रों की निगरानी के कारण बच्चों के टीकाकरण और पोषाहार में सुधार आया है। रांची जिले के लपरा पंचायत की मुखिया श्रीमति पुतुल देवी का कहना था कि उन्होंने  षिक्षा को बेहतर बनाने के लिए एक स्कूल को गोद लिया है।

 बच्चों को सबसे बहुमूल्य संसाधन बताते हुए, यूनिसेफ के झारखंड प्रमुख, श्री जोब जकारिया ने कहा कि, देष का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चों के अधिकारों और उनके लिए षिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण के संकेतकों को कितने अच्छे तरीके से सुनिष्चित किया गया है। उन्हांेने कहा कि ‘‘ बाल मित्र अगुआ पंचायत एक अच्छा विचार, दृष्टि और सपना है। इसे प्राप्त करना कठिन हो सकता है, लेकिन राज्य के मुखियाओं के मजबूत संकल्प को देखते हुए यह असंभव नहीं है’’।

 कोई ग्राम पंचायत या गांव बाल मित्र है कि नहीं यह मापने के 20-25 मानक हैं। इसमें शामिल है – प्रसव के दौरान बच्चे और मां का गांव में मृत्यु न होना, सभी बच्चों की स्कूल में उपस्थिति, बाल श्रम न होना, कोई भी बच्चा कुपोषित न होना और गांव में बाल विवाह का न होना। दूसरे अन्य संकेतक जो किसी गांव का बाल मित्र होना तय करेंगे, वे हैं – सभी बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र,  सभी बच्चों को जन्म के 1 घंटे के अंदर स्तनपान कराना और 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध देना, अस्पतालों में प्रसव, सभी बच्चे का पूर्ण टीकाकरण और बिटामिन – ए की खुराक प्राप्त होना, मलेरिया, डायरिया और न्यूमोनिया ग्रस्त बच्चों का उपचार, शौच के लिए शौचालय का उपयोग और गांव के किसी भी महिला का एनीमियाग्रस्त न होना।

 यदि मुखिया अपने पंचायत को अगुआ बाल मित्र पंचायत बनाना चाहते हैं, तो उन्हें गांव में मिलने वाले मुलभूत सेवाओं की निगरानी करनी होगी और गतिविधियों की संख्या बढ़ाना होगा। उन्हें स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों की देखरेख करनी होगी और यह सुनिष्चित करना होगा कि गुणवत्तायुक्त षिक्षा और सेवाएं प्राप्त हों, स्कूलों में बाल संसद को सक्रिय करना होगा, बच्चों के टीकाकरण, ग्राम स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस पर गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच और नियमित पीडीएस सेवा को सुनिष्चित करना होगा। मुखियाओं को ग्राम समितियों की क्रियाषीलता को सुनिष्चित करने की आवष्यकता पड़ सकती है साथ ही उन्हें महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए एक जागरूक समिति का गठन करना पड़ सकता है। अन्य मानक प्रक्रियाओं में शामिल हैं – महीने में एक दिन पंचायत की बैठक, वर्ष में कम से कम चार बार ग्राम सभा की बैठक आयोजित करना और महीने में 20 दिन पंचायत कार्यालय का खुला रहना।

 श्री जकारिया ने कहा कि, किसी गांव और ग्राम पंचायत को पूर्ण रूप से बाल मित्र होने में 5-10 साल लग सकते हैं, लेकिन मुखिया संकेतकों को लेकर अपने लिए एक लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं, जिसे कई सालों के दौरान विभिन्न चरणों में प्राप्त किया जा सकता है। जो ग्राम पंचायत बाल मित्र केे संकेतकों को हासिल करेंगे, उन्हें जिला एवं राज्य स्तर पर एक विषेष कार्यक्रम के दौरान सम्मानित किया जाएगा और उनकी सफलता की कहानियों को व्यापक पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित किया जाएगा।

 मुखियाओं ने इस बात का भी संकल्प लिया कि  अगले एक सालों में वे कम से कम एक गांव को खुले में शौच से मुक्त करेंगे। इन गांवों मे 100 प्रतिषत शौचालय सुविधा उपलब्ध कराने में निर्मल भारत अभियान के कोष के साथ यूनिसेफ भी तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा।

 पंचायती राज विभाग के सहायक निदेषक, आर के मंडल, यूनिसेफ के आॅफिसर, कुमार प्रेमचंद और सर्ड के विष्णु राजगढि़या के अलावा अन्य लोगों ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया।

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