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युग निर्माता आचार्य तुलसी

Lens Eye - News Portal - युग निर्माता आचार्य तुलसीभारतीय श्रामण्य परम्परा के उज्जल नक्षत्रों में से एक हैं। आचार्य तुलसी भगवान महावीर के सक्षम प्रतिनिधि आचार्य तुलसी तेरापंथ धर्मसंध के नवम आचार्य थे। वे एक संप्रदाय की सीमा में रहकर सम्पूर्ण मानवजाति के लिए काम करने वाले विलक्षण पुरूष थे। वीतरागता के हिमालय पर आरोहण करने का लक्ष्य, महावीर वाणी का प्रकाश पुरी दुनिया में फैलाने का सपना, जातिवाद और सम्प्रयदायवाद की दीवारों को ढहाकर मानवजाति को भाई चारे के पवित्र धागे से आबद्ध करने के प्रयास के साथ संघर्षों से जूझने का गजब जज्बा लिये थे। आचार्य तुलसी का अन्त रंग व्यक्तित्व। अध्यापन कौशल के साथ वे विशिष्ट शिक्षाविद् थे जिन्हो नें तेरापंथ समाज में शिक्षा की क्रान्ति धरित की।
महान परिव्राजक के रूप में आचार्य तुलसी ने हजारों किलोमीटर की पद् यात्राएं की 1 मजदूर की झोपडी़ से लेकर राष्ट्रुपति भवन तक पहुँचे उनकी प्रखर प्रेरणा से लाखों व्य क्ति नशामुक्त बनें। हजारों लोगों ने अपनी जीवन शैली में सुधार किया कुल मिलाकर नैतिकता का अभियान चल पडा़। कन्याकुमारी के तट पन तीन समुद्रों की साक्षी से अपने मानव जाति के उत्थापन के लिए जो सन्देीश दिया वह इतिहास का दुर्लभ दस्ताववेज बन गया।
धर्माचार्य होते हुए भी महान समाज सुधारक के रूप ने आचार्य तुलसी ने नया मोड़ अभियान द्वारा समाज की अनेक कुरूठियों पर प्रहार किया। बाल विवाह,  वृद्ध विवाह, अनमोल विवाह,  मृत्यु भोज, पर्दा प्रथा, अस्पृिश्ययता आदि को जड़ से उखाड़ फेकने में आचार्य तुलसी के अवदान सराहनीय है।
आचार्य तुलसी प्रेरक प्रवचनकार सुप्रसिद्ध संगीतकार और महान सृजनधमा्र साहित्यतकार थे। उनकी साहित्यिक कृतियों में भावबोध, युगबोध और कला बोध के साथ आत्मबोध का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। उन्होनें जहां व वहां दोनों विधाओं में संस्कृ त हिन्दी व राजस्थाानी भावाओं में विपुल साहित्यो का सृजन किया। उन्होंनें सिर्फ साहित्य का ही नहीं साहित्यकारों का भी निर्माण किया।
महान क्रान्तिकारी आचार्य तुलसी ने धर्म के अन्तिस्त त्वय को, उसके दीप्तियान स्वारूप को उजागर करने हेतु धर्मक्रान्ति की उसके पाँच सूत्र दिये – बौद्धिकता, प्रायोगिकता, संमाधायकता, वर्तमान प्रधानता और सर्वधर्म सदभावना।
आचार्य तुलसी भारती सन्त परम्पारा के प्रमुख सन्त् थें। वे कहते थे मैं पहले मानव हूँ, फिर धार्मिक हूँ, फिर जैन हूँ, फिर तेरापंथ का आचार्य हूँ। असली आजादी अपनाओं के शंखनाद के साथ उन्हो नें अणुव्रत आंदोलन का प्रवर्तन किया। देश के प्रथम राष्ट्र्पति आपकी संगोष्ठी में उपस्थित हुए। अणुव्रत के प्रथम अधिवेशन का 1950 में आयोजन हुआ जिसकी अनुगुंज विदेश तक पहुँची।
निज पर शासन फिर अनुशासन का पाठ पढा़ने वाले आचार्य तुलसी महान युगद्रष्टाव थे। अपनी सृजनात्मनक सोच अगाध मनीषा दिगन्तों तक पहुँचने वाली दृष्टि और कल्पाना की उपज से अपने युग को नये आयाम दिये – जैन विश्व भाती समण श्रेणी और ज्ञानशालाओं के साथ.साथ उनके अनेक अवदान है जिससे संघ, समाज व देश आज भी लाभान्वित हो रहा है।
देश की तात्काुलिक समस्याओं के समाधान में आचार्य तुलसी को भूलाया नहीं जा सकता। वे सन 1936 में आचार्य बने छह दशकों तक अनवरत प्रगति शिखरों पर आरूद रहें और और 1994 मे अपने उत्तराधिकारी युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्यद का दायित्वं सौप कर निश्चिंत हो गए। इन शताब्दियों में जैन परम्पपरा के किसी आचार्य ने इतना प्रभावी और नवो – मेष वाला नेतृत्व। किया है क्या ? यह शोध का विषय हो सकता है।

प्रेषक  :: डाॅ. कुसुम लूणिया

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