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रंगोली एक प्राचीन लोक कला

रंगोली एक ऐसी लोक कला है जो हर प्रदेश में अलग – अलग नाम से जानी जाती है पुरे भारत में विभिन्न रूपों में फेली यह लोक कला हर त्यौहार के महत्व को बढाती तो है ही साथ ही उसकी सुन्दरता में भी चार चाँद लगा देती है | यह रंगोली भारत में प्राचीन कला से चली आ रही है , मंदिरों, विवाह, मड्पों, आंगनों और दीवारों पर रंगोली के जटिल आकर्षण नमूने शुभ प्रतीकों के रूप में अंकित किये जातें हैं | आदि काल से हमारे देश में, विशेषकर ग्रामीण अंचलों में लोग अपनी धार्मिक भावना, रंग और सौन्दर्य प्रेम की इन आकृतियों के माध्यम से संतुष्ट करते रहे हैं |

रंगोली धरती पर विभिन्न आकृतियों को अंकित करने वाली बहुत पुरानी लेकिन चिंताकर्सक लोक कला है | यह दिवाली की विशिस्त साजसज्जा का अभिन्न अंग है | रंगोली के मनमोहक डिजाईन, लुभावने रंगों का भराव और मिश्रण सब कुछ उस ब्यक्ति की सौन्दर्य काल्पन की स्वछिक अभिब्यक्ति है जो उन डिजाईनो को फर्श पर साकार करता है | रंगोली के अधिकांश अलंकरण पारपरिक होते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित  कर दिए जाते हैं |

ज्यामितीय नमूने, पुल्पतियां, पशु पक्षी, कमल, मयूर, हंस, तोते, हांथी, आदि | रंगोली के प्रमुख नमूने होते हैं विशेष उत्सवों  पर अधिक जटिल और आकर्षक अंकन किया जाता है | ये नमूने रंगीन पाउडर, फुलपतियों और अनाज के दानो से सजाये जाते हैं |

हर प्रदेश की अपनी अलग तकनीक और डिजाईन होतें हैं | महाराष्ट्र और गुजरात रंगोली के कलात्मक नमूने के लिए विख्यात है | यंहा रेखाओं के लिए बिलोर पाउडर और अंदर के भराव के लिए रंगीन पाउडर का प्रयोग किया जाता है | रंगोली बनाने से पहले उस स्थान के गिले गेरू से लीप दिया जाता है | जब यह सूख जाता है तब सीधी रेखाओं में बिंदिया डाली जाती है और फिर इन बिंदियों को जोड़ कर डिजाईन पूरा किया जाता है | कभी – कभी रुपहला पाउडर छिडक कर नमूने को चमकीला भी बनाया जाता है | रंगोली के चरों और फूलदान या दीपक रख कर इसे और भी चिंताकर्षण बनाया जाता है |

गुजरात में समृद्धि के प्रतीक स्वरूप स्वास्तिक को खूब प्रयोग होता है | आजकल ज्यामितीय नमूनों के अतिरिक्त पौराणिक दृश्य, नृत्य करते स्त्री पुरूष, विभिन्न प्राकृतिक  दृश्य और महँ विभूतियों के चित्र भी ‘फ्री हैण्ड ‘ शैली में बिंदियों की सहायता के बिना अंकित किये जाते हैं |

राजस्थान में किशोरियों विभिन्न प्रकार की कलाओं का अभ्यास करती है | इनमे से प्रमुख है ‘मंदना’ | फर्श और दीवारों को सजाने की यह कला आज बहुत लोकप्रिय हो चुकी है | राजस्थानी किशोरियां अपनी उँगलियों की सहायता से पानी और रंगों का मिश्रण बना कर सुंदर और आकर्षण नमूने बनाती | जिस जगह पर मांडनों का नमूना बनाना होता है, उसे गोबर से लीप दिया जाता है | फिर उस स्थान पर विभिन्न नमूने बनाये जाते हैं | पारंपरिक प्रतीक जैसे सूर्य, चन्द्रमा, तारे, मयूर, लताएँ, तथा ज्यामितीय नमूने अधिक पसंद किये जाते हैं |

प्रस्तुति: सुखविंदर कौर

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