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लोकपाल विधेयक

लोकपाल विधेयक पर अब वैचारिक संहघर्ष कटूता में बदलता जा रहा है। अन्ना हजारे द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के बाद अब तक कांग्रेस के कई मंत्री हजारे के बारे में अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। आरोप-प्रत्यारोप के दौर में अब कटूता झलकने लगी है। सांमान्य तौर पर यह भले ही राजनीतिक लड़ाई दिखे पर इसके अंदर की गहराई बहुत है और लोकपाल विधेयक नहीं बल्कि सत्ता सेत अलग हटकर नई शक्ति खड़ी होने की सुिगबुगाहट ने सत्तारूढ़ों को बेचैन कर दिया है।

आम समझ पर बात करें तो भारतीय जनता का बहुमत स्पतष्ट तौर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई का पैरवीकार है। हर स्तसर पर व्याप्त भ्रष्टाचार सें त्रस्त आम आदमी इस व्यवस्था में सुंधार चाहता है, जहां वाकई भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सके। मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी इसी सो।च के साहथ अन्ना के सारथ खड़ा नजर आ रहा है। लिहाजा इसके सभी पहलुओं पर विचार जरूरी है, ताकि व्यवस्था से़ तेजी सेय विश्वास खोते आम जनता को कोई राहत मिले। यदि ऎसा नहीं हो पाया तो देश में हिंसक आन्दोलनों का दायरा और बढ़ेगा और नक्सलवाद के नाम पर सत्ता के समानांतर केंद्र भी तेजी से। पनपते जाएंगे।

कांग्रेस के कई लोगों ने अन्ना पर समानांतर सत्ता चलाने का आरोप लगाया है। अब तो अन्ना के ट्रस्ट के पैसे के गलत इस्तेमाल सें लेकर अन्ना के सहयोगियों को दाउद इब्राहिम के गुर्गों की तर्ज पर ए कंपनी भी कहा जाने लगा है। कांग्रेस की ओर सेी वैचारिक सं।घर्ष में यह तैयारी की कमी को झलकाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बने और लोकपाल विधेयक के दायरे में सभी को रखा जाए, इसके समर्थक होने के बाद भी संावैधानिक दायरे सेा बाहर जाकर आन्दोलन को समर्थन देना किसी न किसी स्त्र पर संएविधान की ताकत को कम करना होगा। भारतीय सं्विधान में वे साकरे प्रावधान पहले सेा ही मौजूद हैं, जो ऎसे भ्रष्टाचार को रोक सकते हैं। आवश्यकता सिार्फ उसे अमली जामा पहनाने का है।

बहुत ही कठोर शब्दों में अगर कहें तो संयविधान बनाने वालों ने सं़विधान की रचना करते वक्त सपने में भी यह नहीं सोुचा होगा कि आने वाली पीढ़ी इतनी बेइमान और खुदगर्ज हो जाएगी। अगर आजादी की लड़ाई के दौरान संेविधान बनाने वालों को इसका जरा सार आभाष भी होता तो वे निश्चित तौर पर इसके कठोर प्रावधान पहले सेम ही अलग से। कर जाते पर ऎसा हुआ नहीं। फिर भी संाविधान के दायरे में ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रावधान हैं और आवश्यकता है सितर्फ उन प्रावधानों को कारगर बनाने की। लिहाजा कांग्रेस या यूं कहें कि सांासदों के एक वर्ग का अन्ना विरोध इस अर्थ में जायज है। दूसरी तरफ वास्तविकता पर गौर करें तो सािफ नजर आता है कि सत्ता और सरकार दरअसल पांच प्रतिशत लोगों की हिमायती बनकर रह गयी है। भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले सिंर्फ फाइलों में ही उलझकर रह गये हैं। ऎसे में भारतीय जनमानस अगर स‌ामने स‌े अथवा पर्दे के पीछे स‌े अन्ना के सााथ खड़ा है तो उसे स्वी कार किया जाना चाहिए। बात सितर्फ अन्ना या बाबा रामदेव की नहीं है। जिन मुद्दों ने भारतीय जनमानस को उद्वेलित किया है, वे व्यक्तिवादी नहीं है। उन मुद्दों में असली देश का भला निहित है। लिहाजा वाकयुद्ध में लिप्त होने सें बेहतर होगा कि सरकार इन मुद्दों पर जनता का विश्वास जीतने की दिशा में साहर्थक प्रयास करें। वरना जनता जिस तेजी से् जाग नहीं है, उसका प्रमाण अभी नहीं तो अगले चुनाव में अवश्य मिल जाएगा।

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