Guest Writer

स‌ड़कों से संसद तक संकेत

लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर टकराव के बीच लोकतंत्र की गाड़ी आगे बढ़ रही है। स‌ंसद के भीतर इस जनलोकपाल विधेयक का विरोध स‌भी देख चुके हैं। स‌ंसद के भीतर देश के अनेक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने अन्ना के आन्दोलन को स‌ंसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा तक बताया है। लिहाजा टकराव की स‌्थिति बनी है।

इस भीषण परिस्थिति में हाल के दिनों में विकीलिक्स के खुलासे की वजह स‌े स‌त्तापलट की चपेट में आये देशों की स‌्थिति को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वहां के हुक्मरानों ने भी जनता के अन्दर स‌े उठती आवाज के अन्दर छिपे शब्दों को स‌्वीकारना नहीं चाहा। भारत में वैसी खतरनाक स‌्थिति तो नहीं है पर कांग्रेस के लिए अब तक का घटनाक्रम ही अगले चुनाव के लिए कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर चुका है।

बिना गुण-दोष विचार किये इतना तो माना ही जा स‌कता है कि अन्ना हजारे ने अपने आचरण और आह्वान स‌े देश की जनता को जागने का नया अवसर प्रदान किया है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह स‌ुखद स‌ंकेत है। वरना हाल के दिनों में जनता स‌े जुड़े मुद्दों पर जनता की चुप्पी ने स‌त्ता में एक ऎसा वर्ग पैदा कर दिया है, जो किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना चाहता है क्योंकि इससे उसके स‌ाम्राज्य का विस्तार होता है। देश के नौकरशाह, जिन्हें इसी कड़ी में नवसामंत वर्ग कहा जा स‌कता है, इससे स‌बसे अधिक फायदे में हैं।

बताते चलें कि देश में घोटाला कोई भी अनगढ़ नहीं करता। जो कोई भी इस‌में शामिल है, उसे अच्छी तरह पता होता है कि वह जो कुछ भी कर रहा है, वह गलत है। इसके बाद भी व्यवस्था में आयी कमजोरियों ने ऎसे तत्वों को यह विश्वास दिलाया है कि गड़बड़ी करने के बाद भी उनका बाल बांका नहीं होगा। इसी स‌ोच स‌े भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाया है। नतीजा है कि अब चुनाव में आर्थिक प्रभाव अधिक कारगर स‌ाबित हो रहा है।

अन्ना का आन्दोलन ऎसे तत्वों को परेशानी में डालने वाला है। आन्दोलन स‌े जुड़े लोगों में बहुमत युवाओं का है, जिनके बारे में यह कहा जाता रहा है कि यह पीढ़ी बहुत अधिक कैरियर ओरियेंटेड हो गयी है। उसे अपने लाभ के अलावा कुछ भी नहीं दिखता। गांधी टोपी पहनकर दिल्ली के रामलीला मैदान स‌े रांची के अलबर्ट एक्का चौक तक नारे लगाती यह युवा पीढ़ी यह स‌ाबित कर रही है कि वह लोकतंत्र के प्रति भी गंभीर है।

अच्छी बात यह है कि पिछले तीन दशकों में पैदा हुए और बढ़े जिन लोगों ने आजादी के बाद के जनांदोलनों का स‌्वाद नहीं चखा था, वे जनता के बहुमत के उग्र स‌्वर और उसके असर को देख-समझ रहे हैं। जाहिर है कि देश में इसी बहाने एक बार फिर स‌े लोकतंत्र जागृत अवस्था में है, जहां स‌े अच्छी राजनीति की शुरूआत हो स‌कती है।

Rajat Kumar Gupta

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