Holi
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होली Special

Holiरांची, झारखण्ड 06 मार्च 2015 :: होली Special :: पँण्डित रामदेव पाण्डेय

होली की याद या चर्चा आते ही मन मे हर्ष और मस्ती का सँचार हो जाता है ,रगँ अबीर गुलाल और फाग से हम सराबोर हो जाते है , फाल्गुन के आगमन से ही मन मे अल्हडता चली आती है , ऐसा क्यो होता है ?
पोराणिक और वैज्ञानिक कथा :
सृष्टि के विकास के साथ विज्ञान की कथा है यह , भगवान विष्णु का पहला अवतार मछली का था अर्थात जीवन पहले जल से शुरू होती है , अब दुसरा अवतार वाराह (सुअर ) का हुआ ,सुअर पानी और जल दोनो मे चलता है, सुअर अपने मुँह और दाँतो से पृथ्वी को जल से बाहर ला रहे थे , तभी हिरणाक्ष और हिरण्य कश्यपु दो सहोदर राक्षस भाई मिले और वाराह भगवान को रोका और युद्ध करने लगा इस युद्ध मे हिरणाक्ष मारा गया और हिरण्यकश्यपु बच निकला , हिरण्कश्पु की पत्नी कयाधु विष्णु भक्त थी ,इन से प्रह्लाद का जन्म हुआ , प्रह्लाद विष्णु भक्त थे, यह इनके दैत्य पिता हिरण्यकश्पु को पसन्द नही था , साढेचार साल के प्रह्लाद को पढाने के लिए गुरू शुक्राचार्य के पुत्र सुण्डामर्क को रखा गया, पर प्रह्लाद विष्णु के मँत्र के जप का प्रभाव आम जनता को दिखाते और आम जन को भी प्रेरित करते , हिरण्य स्वयँ को ईश्वर घोषित कर दिया , प्रह्लाद ने स्वँय अपने पिता का विरोध किया ,हिरण्य आतातायी होकर पुत्र प्रह्लाद को पहाड से नीचे लुढकाया, हाथी के पैर के नीचे डाल दिया, जब प्रह्लाद नही मरे तो , हिरण्य अपनी बहन होलीका को बुलाया और कहा कि बहन तुम फाल्गुण पूर्णिमा की रात को प्रह्लाद को अपने गोद मे लेकर आग की ज्वाला मे बैठ जाऔ, तुम जिन्दा बच जाऔगी और प्रह्लाद जल कर मर जाऐगा, होलिका ने ऐसा ही किया और होलिका जल कर मर गई और प्रह्लाद प्रँचण्ड ज्वाला मे भी मुस्कुराते हुऐ निकले , इसी उपलक्ष्य मे होलिका दहन ( अगजा ) का प्रचलन शुरू हुआ , इसके दुसरे दिन सुबह जब यह सूचना भगवद् भक्तो को मिली तो होली का स्वरूप ले लिया यह धार्मिक से साँस्कृतिक स्वरूप ले लिया ,
नरसिम्हा अवतार –
भगवान विष्णु का तीसरा अवतार नरसिम्हा का था , गरदन से नीचे शरीर आदमी का परंतु नाखुन और माथा सिँह का था , अब पशु के साथ साथ मनुष्य का स्वरूप आया , यह भगवान विष्णु का उग्र स्वरूप है, जब हिरण्य अपने पुत्र प्रह्लाद को जान से मारने को कटार लेकर तैयार हुआ तो , प्रह्लाद को बचाने के लिऐ यह अवतार हुआ , हिरण्य का वध कर भगवान उसे अपने ही लोक ले गऐ ,यह कथा अध्यात्मिक क्राँति और पिता को सद्गति देने की कथा है ,यह सँयोग है कि इस घटना के बाद प्रह्लाद के पोत्र राजा वलि के लिऐ भगवान का वामन अवतार हुआ ,यह भगवान विष्णु का पहला मानवीय अवतार था ,

होली को सिद्धि मिलती है –
होली के अगजा के दिन और रात को जिस भी मँत्र का जप किया जाय तो सिद्धि मिलती है , दीपावली, नवरात्र , ग्रहण काल की तरह यह सिद्ध रात्रि है ,

होलाष्टक –
होली के आठ दिन पहले होलाष्टक शुरू होकर अगजा के प्रात: काल तक होता है , हिरण्यकश्पु ने इस दिन से ही प्रह्लाद की हत्या का साजिश रच रहा था इसलिए यह आठ दिन खरमास की तरह माना जाता है ,
अगजा की पूजा –
आग हमारे मानव सभ्यता का पहला हितैषी और मित्र है इसलिए हम इसकी पूजन कर कृतज्ञता प्रकट करते है,यह मसाल क्राँति का प्रतीक है , होली के पुर्व सँध्या या भोर मे फाल्णुन पुर्णिमा हो तथा भद्रा न हो तब अगजा जलाते है , इसके पुर्व अगजा स्थल पर गोबर का चोका लगाकर, पकवान और पूजन सामग्री से पूजन करते है गोबर की उपला कण्डे की माला चढाते है , पुन : रात मे अरण्ड के पोधा को अगजा के बीच रखकर इसे ही प्रह्लाद मानकर ,गणेश,शिव, दुर्गा , नरसिह देव, प्रह्लाद , अग्णि , कुलदेव और गाँवदेव की पूजन दस उपचार से करते है पकवान बाटते है , आग मे कच्चा चना , गेहुँ की बाली को पकाते है यह सभी घर परिवार के लोग बाटँकर खाते है ,सुबह आग की राख को तीन बार दाहिने हाथ की तीन उँगली से माथे पर तिलक लगाकर फाग गाते है और खेलते है .

होली के देवता और मँत्र –
होली के देवता श्री नृसिँह देव है , इसे दक्षिण भारत मे नरसिम्हा के नाम से भी जाना जाता है, इनके मँत्र का जितना सम्भव हो जप कर सिद्धि पायी जा सकती है,

होली का मुहूर्त 2015 ई –
5 मार्च के सँध्या बाद पहली बेला मे रात 10: 28 के पहले अगजा / होलिका दहन कल लने का मुहूर्त शुभ है , इस दिन भद्रा सुबह 9:30 बजे समाप्त कर जाता है , इसके बाद घरो मे पूजा कर पकवान आदि बनाया जाता है और होलिका शाम को रोप सकते है ,
होली – धुर्हेड –
6 मार्च को धुरर्हेड होली होगी, अबीर गुलाल रँगो की सुखी होली खेलना शुभ है , इस दिन चैत् कृष्ण प्रतिपदा होती है ,
बरसाने की होली-
होली का धार्मिक और अध्यात्मिक प्रचलन बृन्दावन बरसाने मे अधिक है , यहाँ रगँ भरी दशमी , एकादशी ,लट्टमार होली अगजा के पहले होती है ,पर अगजा के बाद आनेवाले मँगलवार को बुढवा मँगल होली खेली जाती है .

फगुआ –
फगुआ एक विशेष होली का धुन है ,यह फागुन पडते ही गाया जाता है , कँस वध के कर भगवान कृष्ण जब बृन्दावन लोटे तब से बरसाना मे होली की परम्परा लोकप्रिय हुआ, इस मे राम , शँकर, कृष्ण से सम्बन्धित भक्तिमय , और वीर कुवँर सिह से सम्बन्धित राष्टीय धुन गाया जाता है ,प्रेमी, भौजाई और समधन से फाग भी गाया जाता है ,

ठँडी होली –
होली के दिन पूर्णिमा के साथ भद्रा का मेल रहता है, भद्रा (शनि की बहन है)भद्रा के समाप्त होने पर ही होली खेली जाती है , जहाँ अगजा , होलिका ,डुण्ढा राक्षसी जलती है ,वहाँ पर घर का बना पकवान और पूजन सामग्री से पूजन महिलाऐ देर शाम को करती है,इसके साथ एकादशी को बनाया गोबर का कण्डा / उपला भी रखा जाता है , इसे ठण्डी होली कहते है,
नृसिह ध्यान –
श्रीमन्नृकेसरितनो जगदैकबन्धो ,
श्री नीलकण्ठकरूणार्णव सामराज ।
वहीन्दुतीव्रकरनेत्र पिनाकपाणे ,
शीताँशुशेखर रमेश्वर पाहिविष्णो ।।
अर्थ-
मनुष्य एवँ सिँह जैसे शरीर वाले जगत के बन्धु,नीलकण्ठ वाले करूणा सागर ,सामगान से प्रसन्न होनेवाले अग्णि, चन्द्र एवँ सूर्य रूपी तीन नेत्र वाले धर्नुधारी चन्द्रकला धारण करने वाले ,रमा के स्वामी हे विष्णु मेरी रक्षा किजीऐ,
नृसिँह मँत्र –
।। ॐ ह्रौ जय जय नृसिँह ।।
बीज मँत्र – ।। ॐ ह्रौ ।।
नरसिह गायत्री – ।। ॐ नरसिम्हाय विद्यमहे उग्ररूपाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयातँ ।।
फगुआ का गीत –
आज बिरजवा मे होली रे रसिया .
होली रे रसिया , बलजोरी रे रसिया ,ऽऽऽ ।।आज,
कौन के हाथ कनक पिचकारी ,
कौन के हाथ कमौरी रे ऽऽ ।।आज ,,,,
कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी ..ऽऽ
राधा के हाथ कमौरी रे ऽऽ
अपने अपने घर से निकली ऽऽ
कोई श्यामल कोई गौरी रे ऽऽ ।।आज विरजवा ऽऽ
उडत गुलाल लाल भये बादल ऽऽ
केसर रँग मे घोरी रे …ऽऽ
बाजत ताल मृँदग झाँझ डप ऽऽ
और नगर की ज्योरी रे ,,ऽऽ ।। आज …
के मन लाल गुलाल मँगाई ऽऽ
के मन केशर घोरी रे ऽऽ..।। आज ,,,
सौ मन लाल गुलाल मँगाई ,,ऽऽ
दस मन केशर घोरी रे ,,, ऽऽ।।आज ,,,

Content by पँण्डित रामदेव पाण्डेय
Painting by Akashdeep [ Students of Kalakriti ( School of Arts )]

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