भगवान श्री महावीर

भारतीय संस्कृति प्राणवान संस्कृति है। इसमें तीन धाराओं का मूल्यवान योग रहा है- जैन, बौद्ध एवं वैदिक। जैन धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है। जैन दर्शनानुसार कोई आत्मा प्रारम्भ से परमात्मा नहीं होती। आत्मा पर छाये अशुभ कर्मों का सम्पूर्ण क्षय कर प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकती है। अन्य भव्य आत्माओं की तरह महावीर की आत्मा थी। पुराणग्रन्थों के अनुसार आदितीर्थंकर ऋषभदेव के पौत्र मरीचीके भव से इनकी आत्मकथा प्रारम्भ होती है। नयसार से हमें इनके 26 भवों का वर्णन भी प्राप्त होता हैै सत्ताइसवां भव महावीर का रूप है।

जन्मः- भरत क्षेत्र में, राजधानी वैशाली के उपनगर क्षत्रिय कुण्ड ग्राम में महाराज सिद्धार्थ एवं महारानी त्रिशला के घर चैत्र शुक्ल त्रयोदशी सोमवार 27 मार्च 598 ई. पूर्व मध्य रात्रि-उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में महावीर का जन्म हुआ। तत्कालीन प्रख्यात ज्योतिषयों ने-तिथी-नक्षत्र मुहुर्त आदि की विशद-गणना पूर्वक कुमार वर्द्धमान की जन्म कुण्डली बनाई।

 कुण्डली

नामः- साम्रराज्य में धनधान्य की अप्रत्याशित वुद्धि के कारण बालक का नाम वर्द्धमान रखा गया। बाद में प्रभु के अन्य नाम महावीर, श्रमणज्ञातपुत्र, विदेह, वैशालिक, सन्मति, महतिवीर, काश्यप देवार्य आदि भी प्रचलित हुए। वर्धमान ने पुरुषार्थ से परमात्म पद प्राप्त किया इसलिए वे भगवान कहलाये। अपने उपदेशों से अहिंसा, अनेकान्त, स्यादवाद अपरिग्रह, सार्वजीव समभाव जैसे महनीय सिद्धान्तों के प्रतिपादन से सम्पूर्ण प्राणिजगत का भला करने के कारण धर्मतीर्थ के कर्ता अर्थात् तीर्थंकर कहलाये।

दीक्षाः- दो दिन का उपवास, मति, श्रुत एवं अवधिज्ञान के साथ मार्ग शीर्ष कृष्णा दशमी,दिन का तीसरा प्रहर पूर्वाभिमुख महावीर ने पंचमुष्ठिलोच किया। शकरेन्द्र ने केशों को थाल में लिया और उन्हें क्षीर समुद्र में प्रवाहित कर दिया। महावीर ने णमो सिद्धाणंकहते हुए देव-मनुष्यों की विशाल परिषद् के बीच यह प्रतिज्ञा की ‘‘सव्वंमेंअकरणिज्जंपावंकम्मं’’ अब से मेरे लिए सब पापकर्म अकरणीय है। इस अभिव्यक्ति के साथ उन्होंने सामायिक चरित्र स्वीकार किया।

साधनाः- प्राचीन आचार्यों के अभिमत में ते इस तीर्थकरो के कर्मदलिक एक तरफ और भगवान महावीर के कर्मदलिक उनसे भी अधिक। इस कारण महावीर की छद्रमस्तकाल की साधना भीषण उपसर्गो के साथ बड़ी कष्ठपूर्ण औरप्रखर रही।

केवल ज्ञानः- भीषण परीषहों को सहते हुए भगवान महावीर ध्यान एवं तपस्या द्वारा आत्मा को भावित करते-करते ऋजुबालिका नदी के किनारे श्यामक गाथापति के खेत में, शाल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ हो गये। बेले का तप, गोदो हिला का आसन, वैशाख शुक्लादशमी, दिन का अन्तिम प्रहर, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, क्षपक श्रेणी का आरोहण, शुक्ल ध्यान का द्वितीय चरण, शुभभाव, शुभ अध्यवसाय में भगवान ने बारहवें गुण स्थान में मोहनीय कर्म का समूलना शकिया तथा अवशिष्ट तीन धाति कर्म- ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय व अंतराय कर्म का क्षय कर तेरह वेंगुणस्थान में केवल ज्ञान व केवल दर्शन को प्राप्तकिया।

अन्तिम प्रवचनः- सर्वज्ञ भगवान से लाखों लोगों को मार्ग दर्शन मिला।भगवान का जीवन आलोक पुंज था जिसके प्रकाश में अनेको नेतत्व ज्ञान प्राप्त किया। कार्तिक कृष्णा ़त्रयोदशी रात्रि में अन्तिम अनशन कर भगवान देश ना देने लगे। अनेको भव्य जीवों ने अपनी अपनी पात्रता प्रकट कर भगवान के उस अन्तिम उपदेश को आत्मसात कर अपना जीवन धन्य किया- अतः धन्य त्रयोदशी धनतेरसके रूप में मनाई जाने लगी।

निर्वाणः- कार्तिक की अमावस्या को देशना देते-देते प्रभु पर्यकासन में स्थित हो गये शैलेसी अवस्था में पहुँच चार अधातिकर्म-वेदनीय, नाम, गोत्र व आयुष्य का क्षयकर सिद्ध बुद्ध मुक्त बन परिनिर्वाण को प्राप्तकर-परम आध्यात्मिक समृद्धि को प्राप्त किया,चहुँ ओर प्रकाश फैल गया अतः कार्तिक की अमावस्या को प्रकाश पर्व मनाया जानेलगा।

महावीर के प्रमुख सिद्धान्तः- भगवान ने जाति वाद का विरोध करते हुए कहा कि किसी को जन्म नानीच मानना हिंसा है। भगवान के समवसरण में सभी लोग बिना किसी भेदभाव के सम्मिलित होकर-प्रवचन सुनते थे।

भगवान का कथन था शाश्वत् धर्म को टिकाने के लिए हदय की शुद्धता जरूरी है। धर्म के स्थायित्व के लिए पवित्रता अनिवार्य है।

पशु बली का विरोध करते हुए आपने कहा कि हिंसा पाप है। खून से सने वस्त्र से खून साफ नहीं होता अतः हिंसा से बच कर ही धर्म हो सकता है।

भगवान महावीर ने नारी समानता पर जोर दिया और कहा कि आत्म विकास में स्त्री-पुरूष समकक्ष है।

तीर्थंकर महावीर ने दास प्रथा को सामूहिक जीवन का कलंक बताया और व्यक्ति की स्वतन्त्रा पर बल दिया।

अपरिग्रह और इच्छा परिमाण व्रत महावीर की महान देन है।अनेकान्त सूक्ष्मतम अंहिसक दृष्टिकोण से जुड़ा महावीर का महान सिद्धान्त है।

वैचारिक अंहिसा को विकसित करने के लिए उन्होंने स्याद वाद का प्रतिपादन किया। आचार में अंहिसा, विचारों में अनेकान्त, वाणी में स्यादवाद और समाज में अपरिग्रह इन चार मणि स्तम्भो पर भगवान महावीर का जीवन दर्शन अवस्थित है। हमारे जीवन, परिवार, समाज और समग्र विश्व में पल रही समस्याओं का समाधान भगवान महावीर के कालजयी संदेशो को समझकर आचरण में लाने से निश्चित रूप से सम्भव हो सकता है।

महावीर जर्यान्त के पुनीत अवसर पर त्रिशला नन्दन वीर को समर्पित चन्द पंक्तियां-

             

             जिसने जैन धर्म का उद्यान सजाया।

              जिसने मोक्ष प्राप्ति का सोपान दिखाया!

              जिसने एकता की नई राह बनाई।

              जिसने सत्य की नई मशाल जलाई!

              ऐसे महावीर को प्रणाम कीजिए- ऐसे क्रान्तिवीर को प्रणाम कीजिए।

 

                                                       ओमअर्हय

द्वारा ::  डाॅ. कुसुम लुनिया [ 9891947000  ]

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