परशुराम जयन्ती  विशेष – पँड़ित रामदेव पाण्डेय  

रांची, झारखण्ड । अप्रैल  | 29, 2017 ::उन्नीसवी त्रेता युग मे नर्मदा(  मध्यप्रदेश  और गुजरात )के तट पर  भृगु वँशीय ब्राह्मण कुल मे महर्षि जमदग्नि के पाँचवे  सन्तान हुए राम , कुल भृगु का था वही भृगु जिसने तीनो लोको के स्वामी भगवान  विष्णु के सीने पर लात से प्रहार किया था , तो विष्णु ने हज भाव से कहा ब्रह्मदेव भृगु आपने मेरी रक्षा की मुझ पर कृपा की ,जिस चरण रज के लिऐ मुझे आपके पास जाना पडता , झुकना पडता वह आपने कृपा कर दिया ,हलांकि पास खडी लक्ष्मी नाराज हो गयी और श्राप दे दिया कि लक्ष्मी का वास ब्राह्मण  के वंश के पास नही होगा , होगा तो इसका दुरुपयोग ही करेगे , इसी भृगु कुल मे जन्म लेने के कारण इस कुल का नाम भार्गव पडा , पुरूरवा और उर्वशी के सत्रहवीं  वशँ परम्परा मे राजा गाधि (राजधानी कन्नोज, सुलतानगँज मे गंगा को पीकर कान से निकालने वाले जुहू गाधि से छ: पुस्त उपर थे ) की बेटी सत्यवती हुई ,ऋषि ऋचिक ने राजा गाधि को एक हजार सफेद घोडे जिनके कान श्याम रँग के थे दिऐ और सत्यवती से शर्त पूरा कर विवाह कर लिया , एक बार ऋषि से पत्नी सत्यवती और सास ने यज्ञ से सन्तान की इच्छा जाहिर की ,ऋषि ने दोनो के लिऐ अलग -अलग चरू बनाया और मँत्र से अभिमंत्रित किया,लेकिन माँ का चरू बेटी सत्यवती खा गई और सत्यवती का चरू माँ खा गई, ऋषि बोले  इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगा और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगा, इस पर सत्यवती ने ऋचिक से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे, सत्यवती से परशुराम पिता जमदग्नि का जन्म हुआ और सत्यवती के माँ से विश्वामित्र का जन्म हुआ ,इस प्रकार परशुराम के पिता के मामा विश्वामित्र हुऐ , सत्यवती का पुनर्जन्म कौशिकी नदी (कोशी )के रूप मे हुआ , इसी विश्वामित्र को सौं पुत्र हुऐ ,इनके कुछ पुत्र दक्षिण अफ्रीका मे बस गये , उस समय का अफ्रीका का शिव दान अब सूडान हो गया है , जमदग्नि का विवाह इच्छ्वाकु कुल( अयोध्या राज  और जनक राज का कुल )  राजा रेणु की कन्या रेणुका ( कामली ) से हुई ,इनसे पाँच पुत्र हुऐ ,  रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम,

यायावर जीवन

परशुराम का जन्म त्रेता युग के आरम्भ दिन मे बैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को हुआ था,   परशुराम का अभ्युदय काल भारतीय इतिहासकार 2550 ईसा पूर्व मानते है ,लेकिन यह तथ्य प्ररक नही है , चन्द्र वशँ के हैहय कुल के क्षत्रिय  राजाऔ का यज्ञवेता भार्गव वशँ ( परशुराम  के दादा – परदादा ) के लोग थे , भारतीय के पश्चिम- दक्षिण  गुजरात ,महाराष्ट्र, मध्यभारत ,गोवा,अर्थात  भारत के दक्षिण-पश्चिम घाट क्षेत्र मे हैहय वशँ का राज्य था , हैहय राजा ने परशुराम  के दादा ऋचिक को यज्ञधिकार मे बहुत दान दिया , लेकिन जल्दी ही हैहय वँशी राजाऔ को दान दिऐ गये धन और इन्द्र के द्वारा दिया गया कामधेनु  गाय से मोह हो गया और ऋचिक द्वारा दान लिऐ गये धन हेहय क्षत्रिय को वापस न करने पर दोनो  पक्षो मे बात बिगड गयी , परशुराम  के पूर्वज हैहय राज को छोडकर अयोध्या( कन्नौज)  की तरफ चले आऐ ,और रहने लगे ,कहा जाता है कि जमदाग्नि आश्रम  मे (पंचतीर्थी-यह उत्तरप्रदेश में मेरठ के पाद हिंडन (प्राचीन ‘हर’) नदी के किनारे है । यहॉं पॉंच नदियों का संगम है । इसलिये इसे ‘पंचतीर्थी’ कहते है ,   सहस्त्रार्जुन का वधस्थान ) राम का जन्म हुआ , यह चार भाइयो मे छोटे थे , राम ने अपने पिता, कश्यप,  दतात्रेय , अगस्त्य  और शिव जी से शिष्य रूप मे अनेकानेक अस्त्र-शस्त्रों की विद्या सीखी जिसमे ब्रह्मास्त्र, वैष्णव, रौद्र, आग्नेय, वासव, नैऋत, याम्य, कौबेर, वारुण, वायव्य, सौम्य, सौर, पार्वत, चक्र, वज्र, पाश, सर्व, गांधर्व, स्वापन, भौत, पाशुपत, ऐशीक, तर्जन, प्रास, भारुड, नर्तन, अस्त्ररोधन, आदित्य, रैवत, मानव, अक्षिसंतर्जन, भीम, जृम्भण, रोधन, सौपर्ण, पर्जन्य, राक्षस, मोहन, कालास्त्र, दानवास्त्र, ब्रह्मशिरस विद्या सीखी , तो दुसरी तरफ भीष्म और कर्ण को अस्त्र-शस्त्र की दीक्षा दी थी , सम्पूर्ण भू – मण्डल पर अन्याय के लिऐ लडते रहे और सारे भारत मे यायावर की तरह रहे , जिसमे , गोकर्णक्षेत्र (दक्षिण हिंदुस्थान में कारवार जिले में स्थित ‘गोकर्ण’ग्राम)—परशुराम का तपस्यास्थान । समुद्र में डुबते हुये इस क्षेत्र का रक्षण परशुराम ने किया था , जंबुवन (राजस्थान में कोटा के पास चर्मण्वती नदी के पास स्थित आधुनिक ‘केशवदेवराय-पाटन’ ग्राम)—परशुराम का तपस्यास्थान । इक्कीस बार पृथ्वी निःक्षत्रिय करने के बाद परशुराम ने यहॉं तपस्या की थी , परशुरामतीर्थ (नर्मदा नदी के मुख में स्थित आधुनिक ‘लोहार्‍या’ ग्राम)—परशुराम का तपस्या स्थान ,परशुरामताल (पंजाब में सिमला के पास ‘रेणुका-तीर्थ’ पर स्थित पवित्र तालाव)—परशुराम के पवित्रस्थान ,यहॉं के पर्वत का नाम ‘जमदग्निपर्वत’ है , रेणुकागिरि (अलवार-रेवाडी रेलपार्ग पर खैरथल से 5 मील दूर स्थित आधुनिक ‘रैनागिरि’ ग्राम)–परशुराम का आश्रमस्थान ,चिपलून (महाराष्ट्र में स्थित आधुनिक चिपलून ग्राम)—परशुराम का पवित्रस्थान , यहॉं परशुराम का मंदिर है  , रामह्रद (कुरुक्षेत्र के सीमा में स्थित एक तीर्थस्थान)—परशुराम का तीर्थ स्नान , यहॉं परशुराम ने पॉंच कुंडों की स्थापना की थी , इसे ‘संपतपंचक’ भी कहते है , महेंद्रपर्वत (आधुनिक ‘पूरबघाट)—परशुराम का तपस्या स्थान क्षत्रियों का संहार करने के पश्चात् परशुराम यहॉं रहते थे, परशुराम ने समस्त पृथ्वी  कश्यप को दान में दी, उस समय महेंद्रपर्वत भी कश्यप को दान में प्राप्त हुआ , फिर परशुराम’ शूर्पारक’ के नये बस्ती में के लिये गया , शूर्पारक (बंबई के पास स्थित आधुनिक ‘सोपारा’ग्राम)—परशुराम का तपस्यास्थान । समुद्र को हटा कर, परशुराम ने इस स्थान को बसाया था , मातृतीर्थ (महाराष्ट्र में स्थित आधुनिक ‘माहुर’ ग्राम)—रेणुका जमदग्नि  दहनस्थन  है , परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में मिलता है ,परशुराम  चित्रकूट, अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार, मायापुरी (कनखल), काशी, कांची, रंगनाथ (श्रीरंगम), अवन्तिका (उज्जैन) और द्वारिका स्थित वैष्णव तीर्थस्थलों की यात्रा करते हैं। इसके उपरान्त वे शैव तीर्थस्थलों- सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, नागेश्वर, रामेश्वर एवं घुश्मेश्वर के द्वादश ज्योतिर्लिंग – की यात्रा करते हैं। इसके पश्चात वे पुष्कर की तीर्थयात्रा करते हैं। प्रयाग पहुँचे और संगम में स्नान करते हैं। गया मे भी  पितरो के तृप्ति के लिऐ पिण्ड दान करते है , केरल मे दो हजार साल पुराना परशुराम का मन्दिर है ,
दुनिया के प्राचीनतम मार्शल आर्ट कलरिपयट्टु के संस्थापक
परशुराम ने इसकी शिक्षा केरल के निम्न जाति के नायर लोगों को दी
ताकि वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का डट कर मुकाबला कर सकें,
बाहुबल की दम पर भूमि से राजतन्त्र समाप्त कर दिया और सैकड़ों बार
भूमि पर मूल जोत करने वाले किसानों को अधिकार दिया ,मालाबार और कोँकण अर्थात् केरल, कर्णाटक, गोवा,महाराष्ट्र के समुद्री क्षेत्र
को परशुराम क्षेत्र कहा जाता है। परशुराम ने ब्रह्मपुत्र नदी ( नद) को पृथ्वी पर लाया , इसे इसका एक नाम लोहित-कुण्ड भी हुआ ,

कंटक भरा जीवन  पर हुऐ चिरंजीवी

रेणुका पुत्र राम ने जब परशु ( फरसा ) धारण किया तो राम से परशुराम कहलाने लगे , बाल्यकाल मे ही परशुराम ने अपने दादा और पिता को हेहय वशँ के राजाऔ से पीडित और पराजित भी देखा , इस कारण युद्ध विशेषज्ञ हो गये , ये जब  भगवान शंकर से  युद्ध  की शिक्षा लेने गये तो गणेश जी ने इन्हे रोक दिया ,परशुराम नही माने दोनो का युद्ध  हुआ और परशुराम ने गणेश जी का एक दाँत तोड दिया , इस कारण गणेश  एक दन्त कहलाऐ , शिव जी के शिष्य बनने के बाद जब घर आऐ तो पिता जमदग्नि ने पितृ भक्ति की जांच करने हेतु चारो पुत्र से कहा कि अपनी माँ का सिर काट लाओ , क्योकि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका को देर गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण के कारण दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी, चारो बडे भाई  सर झुका लिया, अत्यन्त विचार मंथन करने के पश्चात वे अपने पिता की आज्ञा पालन करने का निश्चय करते हैं, परशुराम ने झट से माँ रेणुका का सिर काट कर पिता की आज्ञा को पुरा किया ,  और कहा कि पिता जी मैने आपका वचन निभाया अब आप मेरी बचन को पुरा करे और मेरी माँ को जिन्दा कर दे , जमदग्नि ने रेणुका को जीवन दान दिया ,और रेणुका को ईच्छा मृत्यु का आशीर्वाद  दिया ,  इसके बाद परशुराम  तप के लिऐ अनेकानेक स्थल पर तप करते रहे , परशुराम और हनुमान  की चर्चा त्रेता और द्वापर दोनो युग मे है , परशुराम  और नरसिंह भगवान विष्णु के उग्र अवतार है , एक तरफ परशुराम  अपने शिक्षा और तप मे यायावर जीवन जी रहे थे तो दुसरी तरफ हेहय क्षत्रिय कार्तवीर्य नर्मदा क्षेत्र  से कन्नौज आकर यमदग्नि के राज्य, कामधेनु गाय  और धन का हरण कर लिया , ( इतिहास को देखे तो यह ब्राह्मण और राजाऔ का युद्ध था जिसमे चन्द्र  हेहय और सूर्य कुल के कुछ राजाऔ ने कार्तवीर्य और इसके पुत्र सहस्त्रार्जुन का साथ दिया ) , इसे भी आगे दुसरी बार सहस्त्रार्जुन  ( सागर तटीय क्षेत्र  के राजा होने के कारण इसके हजारो समुद्री नाव था इस लिऐ यह अर्जुन से सहस्त्रार्जुन और पाताल का  राजा भी कहा जाता था)और भाइयो  ने तपस्या के लिये समाधिस्थ  जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया, तथा वे उसका सिर ले कर भाग गये , जमदग्नि का वध कार्तवीर्य के अमात्य चंद्रगुप्त ने किया जमदग्नि का वध किया था ,परशुराम को घटना की जानकारी होते ही पिता के आश्रम की ओर चले  आश्रम में आते ही माँ रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीट कर जमदग्नि वध की घटना बेटे को सुनाई  , पिता का और्ध्वदैहिक करने के लिये, परशुराम एक डोली में जमदग्नि का शव, एवं रेणुका को बैठा कर, ‘कन्याकुब्जाश्रम’ से बाहर निकला , अनेक तीर्थस्थान एवं जंगलों को पार करता हुआ, यह दक्षिण मार्ग से पश्चिम घाट के मल्लकी नामक दत्तात्रेय क्षेत्र में आया , दतात्रेय के आदेश इसी स्थान पर परशुराम ने पिता का दाह -संस्कार किया , पति के शव के साथ रेणुका अग्नि में सती हो गयी , परशुराम ने मातृ-पितृप्रेम से विह्रल हो कर इन्हें पुकारा , दोनों उस स्थान पर प्रत्यक्ष उपस्थित हो गये ,इसी कारण उस स्थान को ‘मातृतीर्थ’ (महाराष्ट्र में स्थित आधुनिक माहूर) नाम दिया गया ,इस मातृतीर्थ में परशुराम की माता रेणुका स्वयं वास करती है , रेणुका तँत्र  एक विशेष शक्ति श्रोत है , उस समय कर्म वर्ण व्यवस्था थी, इस कारण राजा के बेटी से ब्राह्मण का विवाह होता था ,

वैदिक काल के प्रथम महायुद्ध
वैसे ही जैसे प्रकारांतर में वामपंथी क्रांति के प्रतीक चरित्र चे
ग्वेरा थे। “भुज बल भूमि भूप बिन कीन्ही सहिस बार महिदेवन दीनी ” —
यहाँ भूप माने राजा और महिदेव माने किसान है । परशुराम  ने वही किया ,अपनी माँ की आज्ञा इस तरह स्वीकार किया  रेणुका ने परशुराम को आज्ञा दी, ‘तुम आततायी राजओ का वध करो, एवं पृथ्वी को अत्याचारी विहिन कर दो’, नर्मदा के किनारे मार्कण्डेय ऋषि का आशीर्वाद लेकर, प्रतिज्ञा किया कि इक्कीस बार मेरी माँ ने छाती पीटा तो इक्कीस बार हम इन दुराचारी राजाऔ का संहार करेगे  , यह भीषण प्रतिज्ञा ले लिया ,

 मत्स्य राजा  ,बृहद्वल, सोमदत्त एवं विदर्भ, मिथिला, निषध, तथा मगध देश के राजाओं का भी परशुराम ने वध किया ,सात अक्षौहिणी सैन्य तथा  सुर्यवंशज सुचन्द और पुत्र पुष्कराक्ष  को परशुराम ने वध किया , परशुराम ने कार्तवीर्य के सहस्त्र बाहू काट दिऐ ,कार्तवीर्य के शूर, वृषास्य, वृष, शोरसेन तथा जयध्वज नामक पुत्रों ने पलायन किया , इस तरह परशुराम ने चौसठ्ग करोड आततायी  क्षत्रियों का वध किया ,

 कार्तवीर्य तथा उसके सौ पुत्रों के साथ परशुराम का युद्ध हुआ , पुत्रों का सौ अक्षोहिणी सेना सहित मार दिया , हजारों को पेड पर टॉंग कर मार डाला, तथा उतने ही लोगों को पानी में डुबो दिया , हजारों के दॉंत तोड कर कर नाक तथा कान काट लिये , सात हजार   आततायी  को मिर्च की धुनी दी , बचे हुये लोगों को बॉंधकर, मार कर, तथा मस्तक तोडकर नष्ट कर दिया , गुणावती के उत्तर में तथा खंडवा  के दक्षिण में जो पहाडियॉं में  युद्ध हुआ, उसके बाद कश्मीर, दरद, कुंति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग, विदेह, ताम्रलिप्त, रक्षोवाह, वीतिहोत्र, त्रिगर्त, मार्तिकावत, शिबि इत्यादि अनेक देश के आततायी राजाओं ( सभी राजा क्षत्रिय नही थे ,उस काल  जो राजा बनता  वह क्षत्रिय कहलाता था )  को कीडे मकोडे के समान इसने वध कर दिया,हजारों राजाओं को पकड कर, यह कुरुक्षेत्र ले आया , वहॉं पॉंच बडे कुण्ड खोद कर इसने उसे कैदी राजाओं के रक्त से भर दिया , पश्चात् उन कुंडों में परशुराम ने ‘रुधिस्नान’ किया एवं अपने पितरों को तर्पण दिया ,

वे कुंड ‘समंतपंचक तीर्थ’ था ‘परशुरामह्रद’ नाम से आज भी प्रसिद्ध है ,बाद में गया जाकर चन्द्रपाद नामक स्थान पर इसने श्राद्ध किया , इस प्रकार अद्‌भुत कर्म कर के परशुराम प्रतिज्ञा से मुक्त हुआ ,पितरों की आज्ञा का पालन कर, यह अकृतव्रण के साथ सिद्धवन की ओर गया , रथ, सारथि, धनुष आदिको त्याग कर इसने पुनः ब्राह्मणधर्म स्वीकार किया , इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी, केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र को अपने शस्त्र   दान दिये ,   सब तीर्थो पर स्नान कर इसने तीन बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा की, और महेन्द्र पर्वत पर स्थायी निवास बनाया ,

कौन थे हेहय और सहस्त्रार्जुन

,महिष्मती पुर ( इन्दौर  )  को बसाने वाले राजा महिष्मन्त के वँश मे कनक के पुत्र कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन ही सहस्त्रार्जुन  कहलाया ,सहस्त्रार्जुन ( सहस्रबाहु)  के पराक्रम से रावण भी घबराता था।

राजा ययाति की पत्नी देवयानी ( पिता शुक्राचार्य), से यदु और नहुष हुऐ , यदु से सत्राजित से हेहय ( विष्णु और लक्ष्मी के उद्धार के लिऐ शिव वरदान से राजा ययाति के पुत्र  तुर्वसू ( इनके कई पुत्र हुऐ जो शेष पृथ्वी पर शासन करने लगे इसी वँश मे ईसाई ,यहूदी और इस्लाम पँथ  की स्थापना की ) के पुत्र  हेहय हुए, यमुना और तमासा नदी के तट पर हेहय का जन्म हुआ था ) के दशवी पीढी मे सहस्त्रार्जुन हुए , इसके पुत्र  जयध्वज, शूरसेन, वृषभ,मधु, उर्जित  हुऐ ,जयध्वज से तालजंघ मे विदर्भ और इनके पुत्र  रोमपाद शिशुपाल आदि हुए , मधु के वँश मे वृष्णि , इनके पुत्र  यदु ने यादव वँश की स्थापना की( उस समय यह फ्रेम बन गया था कि परशुराम क्षत्रिय सहाँरक है इस लिऐ नये वँश की स्थापना कर ली  ),वृष्णि के दो पुत्र श्र्वफल्क के वँश मे देवक और उग्रसेन हुऐ , देवक ही भगवान कृष्ण के नाना हुए , उग्रसेन से कँस हुआ , दुसरी तरफ वृष्णि के छोटे पुत्र चित्ररथ से विदुरथ की सातवी पीढी मे सुर हुए , सुर के दस बेटे मे वसुदेव बडे थे, जो कृष्ण के पिता थे , इस प्रकार हेहय वंश का विनाश नही हुआ , यह चन्द्र वँश है , चन्द्र  जैसे घटता बढता है , चन्द्र कलंकित भी है ,

वर्तमान  और हेहय वंश

परशुराम हेहय कुल या क्षत्रिय विरोधी नही थे बल्कि दु: कर्म विरोधी थी , हेहय वँश के विनाश ( परशुराम )  और नन्द वँश के नाश ( चाणक्य)  ब्राह्मण को माना जाता है , पर दोनो वँश को सता से दुर किया गया , हेहय वंश का समुल विनाश परशुराम  ने नही किया , यदि  हेहय वँश का विनाश करते तो आज भी इस वँश की चर्चा नही मिलती  , परशुराम  ने सिर्फ दुराचारी , आततायी राजाऔ  का वध भी किया , यथा योग्य दण्ड देकर भी छोड दिया ,  विन्ध्याचल मुख्य मन्दिर का पीतल का दरवाजा दाता हेहय कुल से है ,छतीसगढ के रायपुर  और रतनपुर राज के राजा कोक्लदेव ( अठारहवी सदी ) हेहय कुल से ही थे , शिव और परशुराम

आठ साल के अवस्था मे कश्यप ने यज्ञोपवीत संस्कार किया और शिव से शिक्षा ग्रहण करने कैलाश चले गये , शिव ने शार्ङ्ग धनुष और दिव्‍यास्‍त्र ‘विद्युदभि परशु’ दिया और  आशीर्वाद देते हुए कहा कि  परशुराम सावर्णि मनु के आठवें मन्वन्तर में सप्तर्षियों में से एक ऋषि होंगे, जिस प्रकार उनके पिता जमदग्नि वैवस्वत मनु के सातवें मन्वन्तर में एक ऋषि हैं। परशुराम शिव को प्रणाम करते हैं और उनसे जाने की अनुमति माँगते हैं।

 परशुराम और महाभारत

वर्तमान वाराणसी ( रामनगर) के राजा की तीन पुत्री अम्बा , अम्बिका और अम्बालिका थी , इनके यहाँ स्वयंवर था इसमे परशुराम के शिष्य और कुरू वँश के गँगा पुत्र भीष्म ने पुरूषार्थ बल से जीत लिया , भीष्म तो आजीवन ब्रह्मचर्य  का व्रत लिया था , अम्बिका का विवाह अपने सौतेले भाई विचित्रवीर्य और अम्बिका का विवाह चित्राँगद से कर दिया , भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास गई,  सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच तैइस दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान और शिष्य  की हत्या के आरोप से  बचने के कारण परशुराम स्वंय युद्ध छोड दिया  इधर अम्बा  शिव भक्त हो गयी , यही दुसरे जन्म मे शिखण्डी होकर भीष्म को ललकारा था ,  भीष्म पितामह से परशुराम  ने गुरू होते हार स्वीकार  कर लिया और भीष्म ने प्रतिज्ञा न तोडा तो परशुराम  ने तय किया कि अब क्षत्रिय को भी विद्या नही देगे , क्योकि जब भीष्म  अपने शस्त्र ज्ञान का दुरुपयोग किया तो अब किस पर विश्वास  करे ?

परशुराम कर्ण के भी गुरु थे, उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था, लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र कहा जाता  था,  कर्ण ने छल ( स्वयं को ब्राह्मण  बालक बता कर )  करके परशुराम से विद्या  लेने का प्रयास किया, परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने लगा, अपने गुरु की नींद मे कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा, वो गर्म लहू बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा, परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है ,जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये  रहा, कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी,

परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे,किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे,तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा,तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके, परशुरामजी ने कहा-“एवमस्तु!” अर्थात् ऐसा ही हो, इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये,  शिवजी ने भगवान परशुराम को शिव का दिव्‍यास्‍त्र ‘विद्युदभि परशु’ दिया था , तो शार्ङ्ग धनुष भगवान  राम को दान ,उपहार  दिया ,

राम और  परशुराम

परशुराम  एक बार मिथिला के राजा जनक ने परशुराम  को स्मरण किया , क्योकि शिव के साँरग धनुष को सीता खेल की घोडा की तरह घसीट रही थी , राजा जनक चिन्तित और भय भीत हुऐ कि इतनी बलशाली सीता को इतना बलवीर पति कैसे मिले तथा यदि यह जानकारी परशुराम  को हो गयी कि बालिका सीता शिव धनुष को घोडा बना खेलती है तो और मुश्किल होगा , विदेह के  स्मरण करते ही परशुराम मिथिला पहुंचे,

 जनक परशुराम को प्रणाम करते हैं। जनक को एक सदाचारी राजा समझते हुए, परशुराम उन्हें निरंकुश क्षत्रियों के समान अपने शत्रु के रूप में नहीं देखते हैं,  परशुराम उनके समक्ष सीता के दर्शन की अपनी अभिलाषा प्रकट करते हैं। जनक उन्हें यज्ञशाला में ले जाते हैं, जहाँ परशुराम शिव धनुष को खेल का घोड़ा बनाकर घसीटती हुईं और उससे क्रीड़ा करती हुईं भगवती सीता के दर्शन करते हैं। परशुराम जनक से सीता स्वयंवर का आयोजन करने को कहते हैं, जिसमें शिव धनुष को तोड़ने में सक्षम राजकुमार ही सीता के पाणिग्रहण के योग्य हो, परशुराम  भविष्यवाणी करते हैं कि रघु के वंशज श्रीराम ही धनुष भंग  करेंगे, परशुराम जनक से कहते हैं कि वे पुनः मिथिला में कुपित होने का अभिनय करते हुए आएंगे जिससे कि उन्हें सीता और राम दोनों के दर्शन का बहाना प्राप्त हो सके,   परशुराम बालिका सीता को प्रणाम करते हैं ,
और हिमालय की ओर चल देते है , कालान्तर मे सीता स्वयंवर मे आदि गुरू शिव का पिनाक  धनुष भंग की प्रतिज्ञा के सीता स्वयंवर मे मिथिला नगर मे परशुराम  उपस्थित हुऐ ,और उपस्थित राजाऔ को चुनौती दिया – “विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही” बताते हुए “बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये” और क्रोधान्ध हो “सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा” तक कह डाला,तब भगवान  विष्णु के अवतार राम चौदह साल के बाल अवस्था मे थे , परशुराम  को देखते ही स्वयंवर मे उपस्थित सभी योद्धा राजा हाथ जोडकर खडे हो गये और अपने  पिता -दादा का नाम लेकर परशुराम के सामने दण्डवत होने लगे , शिव धनुष राम के द्वारा भँग किया जा चुका था ,
श्री राम परशुराम के क्रोध का अपने विनम्र वचनों से निवारण करते हैं, राम स्वीकार करते हैं कि उन्होंने विश्वामित्र द्वारा आदेश दिए जाने पर ही धनुष तोड़ा है, वे परशुराम को अपना गुरु कहते हैं और स्वयं को उनका शिष्य, राम परशुराम से लक्ष्मण के अपमानजनक वचनों के लिए क्षमा मांगते है, जब राम इस प्रकार बोल रहे होते हैं, लक्ष्मण उसी समय परशुराम की ओर देखकर पुनः मुस्कुराने लगते हैं, इससे परशुराम पुनः आगबबूला हो उठते हैं और यह कहते हुए कि वे कोई सामान्य ब्राह्मण नहीं हैं, राम को द्वन्द्व युद्ध के लिए ललकारते हैं, राम परशुराम से कहते हैं कि द्वन्द युद्ध केवल समकक्षों के मध्य होता है और वह परशुराम के संग द्वन्द्व युद्ध करने के योग्य नहीं हैं,वे परशुराम से कहते हैं कि वह (राम) सर्वशक्तिमान हैं किन्तु फिर भी ब्राह्मणों के दास हैं।
राम ने विनय पूर्वक कहा ” अभय होई सो तुमही डेराई “” इसका भाव है कि जिसे कोई देश ,काल ,परिस्थिति ,का भय नही है ,बाबा वो आपसे डरता है , मै वही हूँ ,जिसे आपके पूर्वज भृगु ने छाती पर लात मारा , मै तो सभी जीवो मे हूँ , सभी राजा मेरे प्रतिनिधित्व करते है , आपने उन्हे भी इक्कीस बार महाप्रलय मचाया और काट डाला  , मेरी सृष्टि की रचना मे कई करोड आततायी राजाऔ का वध कर डाला , ब्रह्म श्राप ( नारद श्राप ) से मै जन्म ले रहा हूँ ,जहाँ श्राप नही वँहा भक्ति और यज्ञ से पैदा कर आपके परिजन मुझे पृथ्वी पर लाते है , प्रभू परशुराम  मै तो अभय होते हुऐ भी भय भीत हूँ , पता नही इस विवाह मण्डप मे डोली के पहले किसकी अर्थी उठ जाऐ , इसलिऐ मै भय भीत हूँ गुरूवर ,राम जानते थे कि मै इनके गुरू शिव का धनुष तोड दिया यह भी अपराध है , तत्पश्चात श्रीराम परशुराम के समक्ष अपने महाविष्णु रूप को प्रकट करते हैं और अपने वक्ष:स्थल पर भृगु के चरण चिह्न के दर्शन कराते हैं। अपने पूर्वज के चरणचिह्न को देखकर परशुराम क्रोध के अभिनय को त्याग देते हैं। वे श्रीराम से शार्ङ्ग नामक विष्णु धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहते हैं , शैव  परशुराम  समझ गये कि  राम ही महा विष्णु है , अपना ( शिव जी का दिया ) शार्ङ्ग धनुष राम को सौप कर  तपस्या करने वन को चले गये  “अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता” तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- “कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू”। वाल्मीकि रामायण  के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की , राम तो धर्म सेतु है विश्वामित्र और परशुराम  दादा पोता का मिलन भी यही हुआ ,इसी क्रम मे राम ने पशु, पक्षी, वानरो, वन्यजीवो को मिलाया तो लंका और भारत की संस्कृति को एक किया , यही कारण है कि राम विश्व  देव है ,भारत, इन्डोनेशिया , बर्मा , नेपाल जैसे देश के लोग  राम को अपने देश के  मानते है , महामानव सर्वव्यापी और चिरंजीव भी होते है , राम सर्वव्यापी है तो परशुराम  आज भी चिरंजीव है , भविष्य मेँ उन्हैँ कल्कि भगवानका भी गुरु बनना है , यही जीवन तो वृत है ,,

पँड़ित रामदेव पाण्डेय

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