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वो जाने वाले हो सके तो लौट के आना :: डॉ कलाम को आखिरी सलाम

Abdul-Kalamरांची, झारखण्ड | जुलाई | बुधवार | 29, 2015 :: सन 1998 में बनी दुश्मन फिल्म की गीत चिठ्ठी ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गये यह बरबस जुबां पर आ जा रही है। मन में इस तरह के भाव पूरी तरह से फिट और स्वस्थ मिसाइल मैन के नाम से मशहूर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के अकस्मात इस दुनियां से जुदा होने के कारण हो रहा है। मुल्क के एक महान कर्मयोगी भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम गत 27 जुलाई को कर्म के पथ पर सफर करते करते दुनियां से रुखसत हो गये। कलाम की सख्सियत ऐसी थी कि उनके जाने का गम हर आम वो खास को है। कलाम साहब जात पात मजहबी बंधन से पूरी तरह मुक्त इंसान थे। यही कारण है कि उनके जाने पर सभी मर्माहत हैं।
एक वैज्ञानिक होने के नाते उन्होंने भारत को परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा किया। हिंदुस्तान की सैन्य क्षमता को आगे बढ़ाने के लिये पृथ्वीए ब्रह्मोस जैसी कई मिसाईलो का निर्माण कर पूरी दुनिया में मिसाईलमैन के रुप में ख्याति हासिल की। बचपन में रामेश्वरम की गलियों मे अखबार बेचकर गुजारा करने वाले कलाम ने अपनी योग्यता व क्षमता के बल पर देश का सर्वोच्च पद और सर्वोच्च सम्मान दोनो हासिल किया। अपने मन कर्म और वचन में एकरुपता को बरकरार रखते हुये वे जनता के राष्ट्रपति कहलाये। रामेश्वरम की गलियों से रायसीना हिल्स तक के सफर के बाद भी डॉ कलाम की जीवन शैली में कोई फर्क नहीं पड़ा। 2020 तक भारत को परम वैभव तक पहुंचाने का जो सपना उन्होंने देखा था उसे साकार करने के लिये वे युवाओं को सपना देखने के लिये प्रेरित करने के अभियान में जुट गये। जीवन पर्यन्त उन्होंने उस अभियान को बरकरार रखा। सोमवार को भी वे अपने उसी मिशन के तहत आईआईएम शिलांग में छात्रों का मार्गदर्शन दे रहे थे। लेकिन क्रूर काल को कुछ और मंजूर था। उसने हम सबके बीच से एक वैज्ञानिक, सुनहरे भविष्य का स्वप्नद्रष्टा, एक शिक्षक को छीन लिया। कलाम साहब आज हमारे बीच नहीं हैं फिर भी वे अमर हैं। सोशल मीडिया व समाचार पत्रों में केवल उन्हीं से जुड़ी बातें छाई हुई हैं। जो उनके हमारे बीच न होने का अहसास करा रहीं है। उनके नहीं होने के बाद भी डॉ कलाम के सपने हम सबको सत्पथ पर चलने के लिए प्रेरणा देते रहेंगे। यह सच है कि डॉ कलाम जैसा इंसान कई युगों के बाद पृथ्वी पर अवतार लेता है।अंत में कलाम साहब के लिये मुकेश की गाई गई पंक्तियां याद आ रही है,वो जाने वाले हो सके तो लौट के आना………..

धीरेन्द्र चौबे

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