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यह आलोचना नहीं पर सच्चाई है।

यह आलोचना नहीं पर सच्चाई है। हिन्दी सहित देशज पत्रकारिता अपने पाठकों को दुनिया से सही तरीके से नहीं जोड़ पा रही है। जिन मुद्दों पर आम पाठकों/दर्शकों को जानकारी होनी चाहिए, वैसे गंभीर मुद्दे हिन्दी के पटल पर नहीं आते,जिनका हिन्दी भाषी इलाकों से सीधा सम्बन्ध होता है। वर्तमान में ऎसा ही एक मुद्दा दुनिया के अन्यतम बड़े मीडिया घराने और इंग्लैड की सरकार से जुड़ा है। ब्रिटेन की राजनीति में इन दिनों यही मुद्दा चर्चा में है। रुपर्ट मर्डोक द्वारा माफी मांग लेने के बाद भी सरकार को इस मुद्दे पर सफाई देना पड़ रहा है। टेलीफोन टैपिंग का यह मुद्दा भारतीय परिदृश्य में महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के कार्यालय में इसकी सूचना सार्वजनिक हुई थी। खास तौर पर हिन्दी भाषी प्रदेशों में आधुनिक उपकरणों की मदद सें इस किस्म की कार्रवाई को अनुमति मिली है। खास तौर पर नक्सली राज्यों में ऎसे उपकरणों का इस्तेमाल नक्सली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए की जा रही है। दूसरी तरफ बार-बार यह बात चर्चा में आ रही है कि ऎसे तरीकों का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है, जो गलत है।

बताते चलें कि रुपर्ट मर्डोक के पास दुनिया भर के 176 मीडिया घरानों का स्वामित्व है। इसके बाद भी जब उन्होंने माफी मांगी और ब्रिटिश संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई तो दुनिया भर के लोगों ने इसे देखा। भारत में लोकतंत्र इतना मजबूत अब भी नहीं हुआ है कि मीडिया घराने के किसी बड़े व्यक्ति पर ऎसा आरोप लगे तो उसकी साहर्वजनिक चर्चा हो और संबंधित व्यक्ति को माफी मांगनी पड़े। हालत ऎसे हैं कि ब्रिटेन की आग की लपट अमेरिका तक पहुंच रही है, जहां मर्डोक के लोगों की कार्रवाई की खुलेआम भर्त्सना हो रही है।

टेलीफोन टैपिंग का मामला उजागर होने के बाद दो बड़े पुलिस अधिकारियों पर गाज गिरी है। इसके बाद भी ब्रिटेन मीडिया घराने के मालिक को सस्ते में छोड़ने के मूड में नहीं है। भारत में भाषाई समाचारपत्र और इलेक्ट्रानिक मीडिया इस पूरे घटनाक्रम को अब तक विस्तार सेल अपने पाठकों/दर्शकों तक नहीं पहुंचा पाये हैं। अंग्रेजी अखबारों ने इसे प्रमुखता सेड प्रकाशित किया है।

इसी वजह से अंग्रेजी और भाषाई अखबार/चैनलों के पाठकों/दर्शकों के बीच जानकारी का यह अंतर भारतीय समाज को प्रभावित करता है। ऎसे में सूचना के जगत में पिछड़ने की वजह से् विश्वव्यापी मुद्दों पर भाषाई जानकारी हमेशा अंग्रेजी जानने वालों सेद पिछड़ जाते हैं।

बताते चलें कि पहले एक अखबार के बंद होने के पीछे पत्रकारों को जिम्मेदार ठहराने के घटनाक्रम ने मीडिया जगत के ईमानदार लोगों का ध्यान खींचा था। कुछ लोगों ने मामले की छान-बीन की तो एक के बाद एक नये राज खुलते चले गये। नतीजतन सर पॉल स्टी फेंसन जैसे प्रतिष्ठित पुलिस अधिकारी को कुर्सी छोड़ना पड़ा। इसके बाद भी टैपिंग की आग सुतलगती चली गयी और इस आग ने मर्डोक के करीबी लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। खुद ब्रिटिश प्रधानमंत्री तक को अब इस मुद्दे पर सफाई देना पड़ रहा है।

दूसरी तरफ भारत में इस किस्म के घटनाक्रम अब आम हो चुके हैं। आये दिन राजनीतिज्ञों द्वारा इस किस्म के आरोप लगाये जाते हैं पर जानकारी के अभाव में भाषाई जानकार इन घटनाक्रमों की गंभीरता का आकलन तक नहीं कर पाते। लिहाजा अब जरूरत है कि हम सभी खास तौर पर अपने दायरे में आने वालों को ऎसे घटनाक्रमों और उनके परिणामों के प्रति जागरूक करें ताकि भारतीय समाज ऎसे मामलों के प्रति भी संसवेदनशील बन सके। इससे देश और समाज दोनों का भला ही होगा।
Rajat Kumar Gupta

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