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भ्रष्टाचार

बड़ी अजीब बात है…. कभी ड्राइविंग लाइसेंस, या कोई सरकारी कामों के लिए…. दिया जानेवाला…. खर्चा-पानी या मिठाई का डिब्बा…. या फिर एडमिषन के लिए दिया जानवाला डोनेषन…. और तो और…. सरकार से छुपाकर रखे गए पैसों को बाजार में लगाना…. यानि इन्वेस्टमेंट…. इतना ही नहीं जनता की भलाई में खर्च होनेवाले पैसों से…. अपना विकास करनेवाले….. और रसूखदारों से जिसका गहरा रिष्ता है…. घोटाला….. काम वही…. लेकिन नाम नया…. अंदाज नया…. भ्रस्टाचार नया…. लेकिन अब डर लगता है….. भइया अब तो मिठाई का डिब्बा महंगा पड़नेवाला है…. लेकिन उस बंद मुठ्ठी का क्या…. जो ट्रैफिक सिग्नलों पर खुद-ब-खुद बढ़ जाता है…. उस बेबसवाली मुस्कुराहट का क्या… जो बंद लिफाफों या फिर फाइलों के अंदर से…. नोटों की षक्ल में अफसरों के सामने निकलता है…. उन मासूम चेहरों का क्या…. जिनका भविस्य डोनेषन से तय होता है….वक्त ने करवट ली है…. देस परिवर्तन के दोराहे पर खड़ा है…. लेकिन परिवर्तन से सब डरते हैं…. अब जरूरत हैं…. आदत बदलने की…. वक्त के साथ खुद को बदलने की….. राह मुष्किल है…. पर नामुमकिन नहीं…..

Ritesh

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